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मंगलवार, 12 जुलाई 2011
hey eshwar (tanu thadani)
जब शर्म बेच दी सपनो ने
सच तब से ही शर्मिंदा है !
भाई के गर्दन पे भाई ,
खातिर पैसों के जा चढ़ता ,
कुछ छणिक सुखों के खातिर ही ,
मानव ये क्या-क्या ना करता !
सपने हें ऊँचे बनने के ,
सपने हें तन के चलने के ,
सपने ही सपने जीवन के ,
सोने-चांदी मे पलने के !
सब दो पल की ही खुशियाँ हें ,
सब दो पल के ही सपने हें,
हम दो पल के इस नाटक में ,
अभिनेता हें सो ज़िंदा हें !!
दो पल के सपनो के खातिर ,
हम लरें ही क्यूँ ?
हम मरें ही क्यूँ ??
क्यूँ सपनो के ही खातिर हम ,
अपने भाई का क़त्ल करें ,
हम लूट करें -हम पाप करें ,
अछम्य बना दें अपने को ?
हें कौन विवशता की हम सब ,
बे- शर्म सपन के शहर बसें ?
सचमुच ये सच शर्मिन्दा हे ,
कि क्यूँ कर हम भी जिन्दा हें ??
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